‘चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।’ -अर्जुन उवाच.
अर्थ: हे कृष्ण, मन अत्यंत चंचल, स्वच्छंद, उद्दंड और अत्यंत बलवान है। इसे वश में करना वायु को नियंत्रित करने के समान कठिन है।
इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि…
‘बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।’
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।
मन कितना सूक्ष्म और फिर भी कितना शक्तिशाली होता है, यह हमने पिछले लेख में देखा। मन को समझने के लिए हर किसी को मनोविज्ञान का गहन अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं है।
आत्मविश्वासपूर्ण और ज्ञानमय विचार भी इसी मन में आते हैं, और कल्याणकारी प्रेरणाओं को कुचलने वाले, विवेक का विनाश करने वाले (और कभी-कभी आत्मघात करनेवाले) विचार भी इसी मन में जन्म लेते हैं।
यद्यपि मन को प्रत्यक्ष देखा नहीं जा सकता, परंतु उसका अस्तित्व हमें निश्चित रूप से महसूस होता है। ‘मुझे अंदर से ऐसा महसूस हो रहा है’, ‘मेरा एक मन ऐसा कह रहा है, तो दूसरा मन वैसा!’ — ऐसा हम अपने दैनिक जीवन में अक्सर कहते हैं।
एक वास्तुकार (Architect) का उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए कि वह किसी निर्माण कार्य
एक वास्तुकार (Architect) का उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए कि वह किसी निर्माण कार्य का सर्वेसर्वा (बिल्डर और इंजीनियर) है। आर्किटेक्ट क्या करता है? वह इमारत के लिए उपयुक्त जगह, उस पर खड़ी हो सकने वाली संरचना, उसका आकार, भार सहने की क्षमता (Load bearing capacity), आसपास की परिस्थितियाँ और निर्माण सामग्री आदि का चित्रात्मक और रचनात्मक विचार करके एक योजना कागज या डिजिटल माध्यम पर, कंप्यूटर पर तैयार करता है।
इसी उदाहरण की तरह, हमारे जीवन में जो भी कार्य (योजना) साकार होने वाला होता है, उसे मूर्त रूप देने से पहले हम अपने मन के भीतर कल्पना और चित्र तैयार करते हैं और फिर प्रक्रिया (Process) की शुरुआत करते हैं।
संक्षेप में, निर्माण कार्य के उदाहरण में, प्रत्यक्ष कार्य करने वाला ‘बाह्यमन’ (Conscious Mind) है और प्रेरणा व ढाँचा तैयार करने वाला ‘अंतर्मन’ (Subconscious Mind) है। तो ये दो मन क्या हैं?
वास्तव में मन दो नहीं होते, बल्कि मन के दो स्तर होते हैं। एक आंतरिक स्तर—अंतर्मन, और दूसरा बाहरी स्तर—बाह्यमन। हमारे जीवन भर का संपूर्ण डेटा अंतर्मन में रिकॉर्ड होता है; इसे एक ‘महा-सॉफ्टवेयर’ कह सकते हैं। अंतर्मन में संचित इस डेटा पर ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ जैसा कोई लेबल नहीं लगा होता। वह केवल ‘सूचना’ या ‘जानकारी’ (Information) होती है। उसी डेटा के आधार पर बाह्यमन कई चीजों पर, बातोंपर प्रत्यक्ष प्रक्रिया करने की प्रेरणा देता है।
लेकिन फिर ‘मन के विरुद्ध’ होना और ‘मन के अनुसार’ होना, ये क्या है? यह सब भावनाओं (Feelings) पर निर्भर करता है।
🍀’मेरी उन्नति हुई या कोई अन्य व्यक्ति दरिद्र हो गया, ये केवल भावनाएं हैं, वस्तुस्थिति नहीं।
🍀मेरी ‘उन्नति’ तुलनात्मक दृष्टि से किसी अत्यंत अमीर व्यक्ति के लिए ‘दरिद्रता’ हो सकती है।
अर्थात्, पहली परिस्थिति में मैं सुखी हो सकता हूँ और दूसरी परिस्थिति में दुखी (केवल एक उदाहरण)। अंतर्मन का डेटा केवल इस बात का रिकॉर्ड रखता है कि ‘मेरे पास अमुक धन है’, जबकि मेरा व्यावहारिक बाह्यमन उसी समय सुखी या दुखी महसूस कर रहा होता है।
अर्थात्, अंतर्मन में संचित डेटा पर प्रक्रिया (Process) करके मनचाही चीजें हासिल करना हमारे नियंत्रण में है। विचारों और भावनाओं के लिए कोई ‘लक्ष्य’ (Goal) निर्धारित न होने के कारण हम दिशाहीन होकर भटकते रहते हैं और अपनी मानसिक शक्ति व्यर्थ गँवाते हैं। जैसे सूर्य की बिखरी हुई किरणें अभिसारी लेंस की सहायता से, किसी एक बिंदु पर केंद्रित होने पर, कागज को जला सकती हैं, बिल्कुल वैसे ही हम अपनी मानसिक शक्ति का उपयोग उसे एक विषय एकठ्ठा करके, कर सकते हैं।
यहाँ तक तो स्पष्ट हो ही गया होगा कि, अंतर्मन के डेटा के आधार पर ही सब कुछ घटित होता है। यदि इस डेटा पर प्रोसेसिंग को उत्कृष्ट बनाया जाए, तो जीवन में अधिकतम चीजें मन के अनुसार (इच्छा के अनुसार) घटित की जा सकती हैं! इसी से शोधकर्ता, सफल व्यावसायिक, उत्तम खिलाड़ी, गायक, वादक, वक्ता, कुशल कारीगर, विद्यार्थी और हर महत्वाकांक्षी मनुष्य का निर्माण होता है।
अंतर्मन और बाह्यमन केवल दर्शन या कोरी कल्पना फिलॉसॉफी नहीं, बल्कि एक वास्तविकता है। लेख के आरंभ के कथन के अनुसार, अभ्यास से मन को जीता जा सकता है और जो वांछित (goals) है, उसे प्राप्त किया जा सकता है। हम अपनी कुल मानसिक क्षमता का मुश्किल से 10 प्रतिशत उपयोग कर पाते हैं। यदि हम उसमें 10 प्रतिशत की और वृद्धि कर सकें, तो यह बहुत ही बेहतर होगा। अगली बार यदि कोई आपसे कहे कि आपके भीतर प्रचुर मात्रा में अपार सामर्थ्य है, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें! आप स्वयं किसी भी आधुनिक तकनीक से अधिक कार्यक्षम हैं। आप स्वयं सामर्थ्यवान हैं। आप बहुत महान है।
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