अपनी परंपराओं के माध्यम से हम कुछ विशिष्ट संभावनाओं को अपना लेते हैं। सामान्यतः आपका स्वभाव, आपका सामर्थ्य, आपकी प्रवृत्तियाँ और गुणविशेष — यह सब कुछ आपके पूर्वजों से आया हुआ है, यह अत्यंत संकुचित और मूर्खतापूर्ण विचार है। मै ऐसा कह रही हू इसका कारण जान लीजिए। ऐसा इसलिये है, क्योंकि इस मतप्रवाह के कारण हमारे अस्तित्व और आंतरिक सामर्थ्य पर व्यर्थ ही सीमाएँ (मर्यादाएँ) उत्पन्न हो जाती हैं। यह न भूलें कि पृथ्वी पर आपका अवतरण आपके अंतर्मन से हुआ है। आपके संपूर्ण जीवन- लेखाजोखा (डेटा या हिसाब किताब कह सकते है!) को अपडेट रखने वाला आपका अंतर्मन ही आपका निर्माता है। वह सुबुद्ध (सुजान) है, प्रेमपूर्ण है, और आपको जैसा चाहिए वैसा (मनोवांछित ) फल देने वाला है।
इसलिए थोड़ा जागृत हो जाइए। अपने विकास में नकारात्मक हस्तक्षेप करके, आपकी प्रगति को रोकने वाले व्यर्थ नियमों के साथ एकरूप मत होइए, उन्हें त्याग दीजिए और अपना आत्म-कल्याण साधिए।
मन का स्वरूप (टिपिकल पैटर्न) बदलें। नया जोश उत्पन्न करके सफलता, व्यवहार, आचरण और क्रिया-प्रतिक्रियाओं (एक्शन, रिस्पॉन्सेस) के नए ढांचे (आराखड़े) तैयार करने चाहिए। सीधे शब्दों में कहें तो एक ‘नया मन’ बनाइए। यह मन एक ऐसा नया सॉफ्टवेयर होता है, जो नई योजनाओं, बदलावों, सक्रियता, कार्यों की पूर्ति और आपकी अभिनव इच्छाशक्ति को स्वीकार करने वाला होता है।

अंतर्मन की इस शक्ति की सहायता से आप ऐसी चीजों को हासिल करना शुरू कर सकते हैं, जिन पर आपको खुद को गर्व हो। आप अपने जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं। ‘परिवर्तन संसार का नियम है’— यह केवल गीता का वचन ही नहीं, बल्कि एक शाश्वत वैज्ञानिक सत्य है। प्रकृति और समस्त ब्रह्मांड में हर पल निरंतर परिवर्तन होता रहता है। और हम भी इसे निश्चित रूप से घटित कर रहे हैं।
क्या आपने कभी विचार किया है कि, अनेक महान व्यक्ति अत्यंत हलाहल (हलाखी) परिस्थितियों से जन्म लेते दिखाई देते हैं? ऐसा क्यों भला? उनकी वास्तविकता और उनकी परंपरा तो उन्हें ‘गरीब’ के रूप में लेबल लगाकर निश्चिंत हो चुकी थी ना? फिर ये व्यक्ति इतने श्रेष्ठतम कैसे बन गए? आप ही बताईये।
इसका उत्तर केवल एक ही है —अंतर्मन की अगाध शक्ति के बल पर।
इन सभी ने स्वयं के अंतर्मन पर कार्य किया और अपनी इच्छाशक्ति को शुद्ध स्फटिक की तरह लक्ष्य-केंद्रित (फोक्स्ड) तथा निरंतर बनाए रखा। और आगे बढ़ते रहे। फिर एक दिन सारा संसार ही उनके कर्तृत्व, उनकी कामगिरी और उनके अनुसंधान से प्रभावित हो गया, और इसी दुनिया ने उनके व्यक्तित्व पर लगे सारे पुराने लेबल हटा दिए, तथा उन्हें महानता प्रदान की।
यह सब कुछ हुआ है और अनंत काल तक यह संभव होता रहेगा— तो केवल और केवल हमारे अंतर्मन, बाह्यमन, बुद्धि और चेतना की उत्तम मित्रता के कारण ही। आइए, हम सब मिलकर इस बात पर विचार करें।
तो क्यों न आज से ही शुरुआत की जाए? फिर हम अपने अंतर्मन से क्या-क्या माँगे?! — विवेक, प्रेम, शांति, सुझबुझ (सुजाणता), ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता, विभिन्न नई संकल्पनाएँ और उन सबको उचित पद्धतीसे – कार्यान्वयन करने (अमल में लाने) की तूफ़ानी ताक़त!
संमोहन के उपचार क्षेत्र में मैं अनेक वर्षों से काम करते हुए, कई मन से मिली हूँ। हताश और खिन्न होकर बैठे हुए यही मन, जब सकारात्मकता से ओत-प्रोत हो गए, तब वे सभी स्वयं ही दीपस्तंभ बन गए! और उनके नैराश्यों की कालिख जब पूरी तरह नष्ट हो गई, तब उनका ‘जीवन परिसर’ उनके ही प्रकाश से जगमगा उठा… उनके अंदर स्वयंविकास का प्रोग्राम निरंतर रूप से कार्यान्वित हो गया।

Dr. Sunetra Javkar 9820373281 ©
Hypnotherapist, Mind Counselor, Naturopath, Past Life Regression & Crystal Healing Therapist. QUANTUM HOLISTIC HEALTH.

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